आस्तीकन मेला: आस्था का प्रतीक आस्तीकन, सावन में उमड़ता है श्रद्धा का सैलाब

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आस्तीकन मेला: आस्था का प्रतीक आस्तीकन, सावन में उमड़ता है श्रद्धा का सैलाब

आस्तीकन मेले में उमड़ेगा श्रद्धा का सैलाब, सावन की दशमी पर जुटेंगे हजारों श्रद्धालु

मिल्कीपुर, अयोध्या। चौरासी कोसी परिक्रमा पथ पर स्थित पौराणिक आस्तीक आश्रम में नाग पंचमी से शुरू हुआ आस्तीकन मेला शनिवार को दशमी तिथि पर अपने चरम पर पहुंचेगा। सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं और लोक परंपराओं से जुड़ा यह मेला सावन में ग्रामीण संस्कृति और आस्था का जीवंत प्रतीक बन जाता है।

अयोध्या जिला मुख्यालय से करीब 32 किलोमीटर दक्षिण अयोध्या-रायबरेली मार्ग पर इनायत नगर-बीकापुर मार्ग स्थित ऋषि आस्तीकन बाजार में यह आश्रम है। श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी से शुरू होने वाला मेला रक्षाबंधन तक चलता है। दशमी तिथि पर यहां सबसे बड़ा मेला लगता है। श्रद्धालु बाबा आस्तीक के मंदिर में पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और नाग देवता के कोप से रक्षा की कामना करते हैं।

मेले की सबसे खास परंपरा नाग पंचमी और दशमी को देखने को मिलती है। मान्यता है कि आश्रम के पुजारी पर बाबा आस्तीक की सवारी होती है। पूजा और हवन के बाद पुजारी करीब दो किलोमीटर दूर बीरबल पुरवा स्थित अपने घर से खेतों के रास्ते दौड़ते हुए आश्रम पहुंचते हैं और मंदिर के सामने स्थित तालाब में छलांग लगाकर स्नान करते हैं। इसके बाद ऋषि आस्तीक की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान दर्जनों पुरोहित मंत्रोच्चार करते हैं और सैकड़ों श्रद्धालु इस धार्मिक परंपरा के साक्षी बनते हैं।

मेले में विभिन्न जिलों से दुकानदार पहुंचे हैं। मिठाई, लकड़ी के सामान, बर्तन, साज-सज्जा और घरेलू उपयोग की वस्तुओं की दुकानें सज गई हैं। बच्चों और युवाओं के लिए झूले, सर्कस और मौत का कुआं जैसे आकर्षण भी लोगों को लुभा रहे हैं। सुरक्षा के लिए पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं।

तक्षक नाग को ऋषि आस्तीक ने दिलाया था क्षमादान

श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कंध में वर्णित कथा के अनुसार, राजा परीक्षित की सर्पदंश से मृत्यु के बाद उनके पुत्र जन्मेजय ने सर्पों के विनाश के लिए यज्ञ कराया था। यज्ञ में तक्षक नाग देवराज इंद्र के सिंहासन से लिपट गया। तक्षक को भस्म करने का मंत्रोच्चार होने पर इंद्रासन हिल उठा। देवताओं के अनुरोध पर ऋषि आस्तीक ने तक्षक को क्षमा दिलाई। तभी से मान्यता है कि आस्तीक मुनि की पूजा से नागवंश के आक्रोश से मुक्ति मिलती है।


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