
भरतकुंड में पिंडदान: गया से पहले क्यों आते हैं श्रद्धालु? जानें भगवान राम से जुड़ी मान्यता
अयोध्या। पितृपक्ष में अयोध्या के नंदीग्राम स्थित भरतकुंड पर आस्था, विश्वास और भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। अपने पितरों की आत्मा की शांति और तर्पण के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंच रहे हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने अपने पिता महाराज दशरथ का श्राद्ध और पिंडदान इसी पावन स्थल पर किया था। इसी मान्यता के चलते पितृपक्ष में देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु भरतकुंड पहुंचते हैं।
बिहार के गया में पिंडदान और तर्पण की परंपरा बेहद प्रसिद्ध है, लेकिन अयोध्या का भरतकुंड भी पितृकर्म की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने वनवास से लौटने के बाद नंदीग्राम स्थित भरतकुंड पर अपने पिता दशरथ का पिंडदान किया था।

धार्मिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीराम के अनुरोध पर हनुमानजी गया से 16 विष्णुपद पिंडियां लेकर आए थे। इसके बाद भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न ने यहां अपने पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया। मान्यता है कि श्रीराम के आदेश पर हनुमानजी ने एक पिंडी भरतकुंड में स्थापित की, जबकि शेष 15 पिंडियां गया में स्थापित की गईं। इसी धार्मिक परंपरा से भरतकुंड को गया कुंड और गया बेदी के नाम से भी जोड़ा जाता है।
गया से पहले भरतकुंड आने की मान्यता
स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, भरतकुंड में पिंडदान किए बिना गया में किया गया पितृकर्म पूर्ण नहीं माना जाता। यही वजह है कि पितृपक्ष के दौरान कई श्रद्धालु पहले नंदीग्राम के भरतकुंड पहुंचते हैं और यहां पिंडदान एवं तर्पण करने के बाद गया की यात्रा करते हैं।
पितृपक्ष के दिनों में भरतकुंड पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई देने लगती है। लोग विधि-विधान से पिंडदान, तर्पण और पूजा-अर्चना कर अपने पितरों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम और उनके पिता महाराज दशरथ से जुड़ी स्मृतियों का भी प्रतीक है।
अयोध्या की धार्मिक परंपराओं में नंदीग्राम और भरतकुंड का विशेष स्थान माना जाता है। पितृपक्ष में यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु अपने पितरों की शांति की कामना करते हैं और भगवान श्रीराम की इस परंपरा को श्रद्धा के साथ आगे बढ़ाते हैं।
