‘विद्या शक्ति पहल’ का असर, 63,106 निरक्षर महिलाओं को शिक्षा से जोड़ने का अभियान

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‘विद्या शक्ति पहल’ का असर, 63,106 निरक्षर महिलाओं को शिक्षा से जोड़ने का अभियान

विद्या शक्ति पहल से ग्रामीण महिलाओं को मिल रही शिक्षा और आत्मनिर्भरता की राह

अयोध्या। जिला प्रशासन ने ग्रामीण क्षेत्र की निरक्षर महिलाओं को बुनियादी शिक्षा से जोड़ने के लिए ‘विद्या शक्ति पहल’ शुरू की है। समुदाय आधारित इस वयस्क साक्षरता कार्यक्रम के माध्यम से स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) से जुड़ी महिलाओं को शिक्षा देकर उन्हें आर्थिक रूप से अधिक सक्षम, जागरूक और आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।जनगणना-2011 के आंकड़ों के अनुसार अयोध्या में महिलाओं की साक्षरता दर करीब 59 प्रतिशत थी। पहल के तहत स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 63,106 निरक्षर महिलाओं को चिह्नित कर साक्षरता अभियान से जोड़ा गया है। करीब 3,200 विद्या सखियां इन महिलाओं को पढ़ाने में सहयोग कर रही हैं।

गांव की महिलाएं बनीं विद्या सखी

कार्यक्रम के तहत स्थानीय स्वयं सहायता समूहों की साक्षर महिलाओं को प्रशिक्षण देकर ‘विद्या सखी’ बनाया गया है। प्रत्येक विद्या सखी अपने गांव की करीब 10 से 20 महिलाओं को पढ़ाती है। इससे महिलाओं को अपने ही गांव और परिचित माहौल में बिना झिझक पढ़ने का अवसर मिल रहा है।

गांवों में चौपाल, घर के आंगन और अन्य सुविधाजनक स्थानों पर कक्षाएं संचालित की जा रही हैं, ताकि महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों के साथ शिक्षा भी जारी रख सकें। विद्या सखियों को स्लेट, चॉक, अक्षर एवं संख्या चार्ट और पोर्टेबल ब्लैकबोर्ड समेत आवश्यक शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराई गई है। अभियान के लिए 3,150 लर्निंग किट खरीदी गई हैं।

40 हजार से अधिक महिलाओं की पोर्टल पर टैगिंग

विद्या शक्ति पहल को केंद्र सरकार के उल्लास (न्यू इंडिया लिटरेसी प्रोग्राम) से भी जोड़ा गया है। अब तक 40 हजार से अधिक शिक्षार्थियों को उल्लास पोर्टल पर टैग किया जा चुका है। इसके माध्यम से सीखने की प्रगति की डिजिटल निगरानी के साथ वयस्क साक्षरता का आधिकारिक प्रमाणपत्र प्राप्त करने की व्यवस्था भी की जा रही है। दैनिक वीडियो कॉल के माध्यम से अभियान की निगरानी की जा रही है। महिलाओं की साक्षरता में सुधार का आकलन जनगणना-2027 के दौरान किया जाएगा।

हस्ताक्षर से बैंक लेनदेन तक बढ़ा आत्मविश्वास

पहल का असर महिलाओं के दैनिक जीवन में भी दिखाई देने लगा है। अब कई महिलाएं अंगूठा लगाने के बजाय अपना नाम लिखकर हस्ताक्षर करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। बैंक पासबुक पढ़ने, स्वयं सहायता समूह के ऋण का हिसाब रखने और मनरेगा की मजदूरी का भुगतान जांचने में भी साक्षरता मददगार बन रही है।साक्षर माताएं बच्चों की पढ़ाई और स्कूल में उपस्थिति पर बेहतर नजर रख पा रही हैं। वहीं ग्रामसभा की बैठकों में भागीदारी और गांव की समस्याओं को सामने रखने में भी महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ रहा है।

जिला प्रशासन की यह पहल स्वयं सहायता समूहों की ताकत, स्थानीय महिला नेतृत्व, गांव स्तर पर लचीली शिक्षा व्यवस्था, सीएसआर के सहयोग से उपलब्ध शिक्षण संसाधनों और डिजिटल निगरानी को एक साथ जोड़कर ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में सामने आई है।


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